शासन

निजी शिक्षा बाज़ार में स्थानीय राजनेताओं का प्रभाव

  • Blog Post Date 31 जुलाई, 2025
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Muneer Kalliyil

Indian Institute of Management Bangalore

Muneer.kalliyil19@iimb.ac.in

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Soham Sahoo

Loughborough University and Indian Institute of Management Bangalore

soham.sahoo@iimb.ac.in

भारत में स्कूलों की संख्या और छात्र नामांकन- दोनों के सन्दर्भ में निजी स्कूली शिक्षा का तेज़ी से विस्तार हुआ है। इस लेख में 2005-2017 के आँकड़ों का विश्लेषण करने पर, पता चलता है कि सत्तारूढ़ दल से जुड़े राजनेताओं के निर्वाचन क्षेत्रों में, विपक्षी नेताओं के निर्वाचन क्षेत्रों की तुलना में, निजी स्कूलों में काफ़ी ज़्यादा वृद्धि देखी गई है और यह वृद्धि संभवतः नौकरशाही पर उनके प्रभाव के कारण हुई है। हालांकि, इससे शैक्षिक गुणवत्ता में कोई सुधार नहीं होता है।

 निजी स्कूली शिक्षा, ख़ासकर पिछले कुछ दशकों में, भारत के शिक्षा परिदृश्य का एक महत्वपूर्ण घटक रही है। देश में निजी स्कूलों की वृद्धि सरकारी स्कूलों की तुलना में कहीं अधिक रही है और निजी संस्थान बच्चों के लिए बेहतर शिक्षा चाहने वाले कई परिवारों के लिए एक प्रमुख विकल्प बन गए हैं। वर्ष 2005 और 2017 के बीच, निजी स्कूलों की संख्या लगभग तीन गुनी हो गई, जबकि सरकारी स्कूलों में अपेक्षाकृत मामूली वृद्धि देखी गई (आकृति-1)। यह प्रवृत्ति छात्र नामांकन के रुझानों में भी परिलक्षित होती है। वर्ष 2005 और 2017 के बीच, सरकारी स्कूलों में छात्रों के नामांकन में 16% की गिरावट देखी गई, जबकि निजी स्कूलों में 270% की उल्लेखनीय वृद्धि पाई गई।

आकृति-1. भारत में सरकारी और निजी स्कूलों का विस्तार

स्रोत : शिक्षा के लिए जिला सूचना प्रणाली।

निजी स्कूली शिक्षा के इस विस्तार के कारणों की जाँच करते हुए, मौजूदा शोध ने मुख्य रूप से निजी बनाम सरकारी स्कूलों के सापेक्ष प्रदर्शन और शिक्षा बाज़ार की गतिशीलता पर ध्यान केंद्रित किया है (मुरलीधरन और सुंदररमन 2015, सिंह 2015, अंद्राबी एवं अन्य 2024)। शोध साहित्य के एक अन्य पहलू ने दर्शाया है कि स्थानीय राजनेता अपने निर्वाचन क्षेत्रों में शिक्षा के परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं (क्लॉट्स-फिगुएरस 2012, लाहोटी और साहू 2020)। हमारा अध्ययन एक कम जाँचे गए आयाम- निजी स्कूलों की स्थापना पर स्थानीय राजनीतिक नेताओं का प्रभाव, का विश्लेषण करके इस शोध साहित्य में योगदान देता है। विशेष रूप से, हम इस बात का पता लगाते हैं कि क्या सत्तारूढ़ दल से जुड़े राजनेताओं (अर्थात, विधान सभा के सदस्य या विधायक) के प्रतिनिधित्व वाले राज्य विधानसभा क्षेत्रों में निजी स्कूलों में उच्च वृद्धि देखी गई है (कल्लियिल और साहू 2024)।

निजी स्कूल शुरू करने से पहले विभिन्न चरणों में कई सरकारी अनुमोदनों वाली एक जटिल नियामक प्रक्रिया से गुज़रना पड़ता है (मेहेंदले 2020)। इसके निर्माण चरण के दौरान, स्कूल प्रशासन को स्थानीय अधिकारियों से अग्नि सुरक्षा, जल आपूर्ति, स्वच्छता और संरचनात्मक फिटनेस प्रमाणपत्र सहित कई मंज़ूरियाँ प्राप्त करनी होती हैं। भौतिक अवसंरचना पूरी हो जाने के बाद, एक महत्वपूर्ण कदम राज्य सरकार से 'अनापत्ति प्रमाण पत्र' (एनओसी) प्राप्त करना है। एनओसी यह प्रमाणित करता है कि संस्थान ने ज़रूरी नियामक आवश्यकताओं को पूरा कर लिया है और सरकार को इसके आगे के प्रमाणन पर कोई आपत्ति नहीं है। यह दस्तावेज़ स्कूल के लिए आगे की औपचारिक मान्यता और विभिन्न शैक्षणिक बोर्डों से संबद्धता के आवेदन के लिए अनिवार्य है।

एनओसी प्राप्त करना अक्सर एक कठिन प्रक्रिया होती है जिसके लिए सरकार से जुड़े कई हितधारकों के साथ पत्राचार की आवश्यकता होती है। यह प्रक्रिया राज्य स्तर पर स्कूल शिक्षा विभाग के अधिकारियों के विवेक पर निर्भर करती है, जिससे अक्सर आवेदन प्रक्रिया में देरी और बाधाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। ये बाधाएँ अतिरिक्त अनुमोदन शर्तों, स्पष्टीकरण के अनुरोधों, बार-बार दस्तावेज़ प्रस्तुत करने आदि के रूप में हो सकती हैं। इस स्तर पर, राजनेता नौकरशाही प्रक्रियाओं पर अपने नियंत्रण के माध्यम से नियमों के प्रवर्तन को प्रभावित करके एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उनके प्रभाव की सीमा सत्तारूढ़ दल के साथ उनके गठबंधन से निकटता से जुड़ी हो सकती है, जिससे प्रक्रिया कितनी कुशलता से सामने आती है, इस पर असर पड़ता है।

कार्यप्रणाली और आँकड़े

हमारे शोध में वर्ष 2005 से 2017 की अवधि को कवर करने वाले निर्वाचन क्षेत्र-स्तरीय पैनल आँकड़ों और एक निकट-चुनाव 'प्रतिगमन असंततता डिज़ाइन' (आरडीडी) का उपयोग करके भारत में निजी शैक्षणिक संस्थानों के विकास पर राजनीतिक गठबंधन के प्रभाव की जाँच की गई है। आरडीडी के ज़रिए हम उन निर्वाचन क्षेत्रों की तुलना करके सत्तारूढ़ दल के गठबंधन के कारणात्मक प्रभाव का अनुमान लगा पाते हैं, जहाँ सत्तारूढ़ दल से जुड़े उम्मीदवारों ने मामूली अंतर से जीत हासिल की और जहाँ वे मामूली अंतर से हारे हैं। इस दृष्टिकोण से हमें राजनीतिक संरेखण के प्रभाव को अन्य कारकों से अलग करने में सहायता मिलती है जो स्कूल के विकास को प्रभावित कर सकते हैं, क्योंकि इस विश्लेषण में जिन निर्वाचन क्षेत्रों पर विचार किया गया है, वे अन्य पहलुओं में समान होने की संभावना रखते हैं।

विधानसभा क्षेत्र स्तर पर स्कूलों और उच्च शिक्षा संस्थानों की संख्या के आँकड़े, जिला शिक्षा सूचना प्रणाली (डीआईएसई) और अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण (एआईएसएचई) से प्राप्त जानकारी का उपयोग करके तैयार किए जाते हैं, जो भारत में स्कूल और उच्च शिक्षा के आँकड़ों के लिए प्राथमिक स्रोत हैं।

मुख्य परिणाम

सबसे पहले हम पाते हैं कि सत्तारूढ़ दल से जुड़े राजनेताओं के निर्वाचन क्षेत्रों में विपक्षी नेताओं के निर्वाचन क्षेत्रों की तुलना में निजी स्कूलों की वृद्धि दर काफ़ी ज़्यादा है। औसतन, सत्तारूढ़ दल से जुड़े निर्वाचन क्षेत्रों में निजी स्कूलों की वृद्धि दर लगभग 3 से 5 प्रतिशत अंक ज़्यादा है। इससे पता चलता है कि सत्तारूढ़ दल के राजनेता अपने निर्वाचन क्षेत्रों में निजी स्कूलों की स्थापना में सक्रिय रूप से मदद करते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि हमें सरकारी स्कूलों की वृद्धि दर पर सत्तारूढ़ दल के गठबंधन का कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं दिखता। इस तथ्य के बावजूद कि विधायक मुख्य रूप से अपने निर्वाचन क्षेत्रों के लिए सरकारी संसाधनों और सुविधाओं की व्यवस्था के लिए ज़िम्मेदार होते हैं, सत्तारूढ़ दल से जुड़े और गुटनिरपेक्ष निर्वाचन क्षेत्रों के बीच, सरकारी स्कूलों की वृद्धि दर में कोई ख़ास अंतर नहीं दिखाई देता है।

सरकारी और निजी स्कूलों के बीच इस अंतर को सरकारी स्कूलों की स्थापना में आमतौर पर अपनाई जाने वाली केंद्रीकृत योजना प्रक्रिया से समझा जा सकता है, जिसका निर्णय मुख्यतः राज्य स्तर पर न्यूनतम स्थानीय भागीदारी के साथ होता है। इसके विपरीत, निजी स्कूलों की स्थापना अक्सर स्थानीय पहल और सामुदायिक भागीदारी के परिणामस्वरूप होती है, जिसके चलते वे स्थानीय, पार्टी-समर्थित राजनीतिक नेताओं के प्रभाव के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। हमें उच्च शिक्षा संस्थानों में भी इसी तरह के पैटर्न नजर आते हैं- निजी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के सन्दर्भ में विकास प्रभाव महत्वपूर्ण है, लेकिन सरकारी उच्च शिक्षा संस्थानों के सन्दर्भ में यह नगण्य हो जाता है।

प्रणाली

उपलब्ध प्रमाणों से पता चलता है कि सत्तारूढ़ दल से जुड़े विधायक अपने निर्वाचन क्षेत्रों में उच्च आर्थिक विकास को बढ़ावा देते हैं (एशर और नोवोसाद 2017)। जहाँ तक उच्च विकास का तात्पर्य निजी स्कूली शिक्षा के लिए भुगतान करने की अधिक इच्छा से है, तो यह निजी स्कूलों के विस्तार का प्रमुख कारण हो सकता है। इस मुद्दे की जाँच करने पर, हम पाते हैं कि यद्यपि आर्थिक विकास सत्तारूढ़ दल से संबद्ध नेता के होने के कारण बढ़ता है, इसका असर निजी स्कूलों के विस्तार पर पड़ने वाले प्रभाव पर नहीं होता है। इसके अलावा, चुनावी अवधि में किया गया 'विविधता विश्लेषण' दर्शाता है कि निजी स्कूलों का विस्तार आर्थिक विकास से पहले होता है, जो यह दर्शाता है कि माँग-आधारित मुद्दा हमारे परिणामों का मुख्य आधार नहीं है।

वैकल्पिक तंत्रों के रूप में, हमारा विश्लेषण इस बात पर प्रकाश डालता है कि सत्तारूढ़ दल से जुड़े राजनेताओं का नौकरशाही तंत्र पर प्रभाव देखे गए परिणामों के पीछे का एक प्रमुख कारक हो सकता है। निर्वाचित प्रतिनिधियों, विशेष रूप से सत्तारूढ़ दल से जुड़े विधायकों का प्रशासनिक निर्णयों पर पर्याप्त अनौपचारिक नियंत्रण होता है, जिसमें नौकरशाही नियुक्तियों और स्थानांतरणों को प्रभावित करने की क्षमता भी होती है (अय्यर और मणि 2012)। इसके अतिरिक्त, विधायक अक्सर विभिन्न जिला-स्तरीय समितियों में पद धारण करते हैं, जिनमें शिक्षा से संबंधित समितियाँ भी शामिल हैं। यह नियंत्रण निजी स्कूली शिक्षा के सन्दर्भ में विशेष रूप से प्रासंगिक हो जाता है, जहाँ नए संस्थानों की स्थापना के लिए कई नौकरशाही अनुमोदनों की आवश्यकता होती है। निजी स्कूलों की स्थापना में भागीदारी प्रत्याशित लाभों से भी प्रेरित हो सकती है, जिसमें सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाने से लेकर आर्थिक लाभ प्राप्त करना शामिल हो सकता है। इसके अलावा, हमारे निष्कर्षों से पता चलता है कि सत्तारूढ़ दल से संबद्ध निर्वाचन क्षेत्रों में निजी स्कूलों की उच्च वृद्धि स्वयं राजनेताओं द्वारा शैक्षणिक संस्थानों में निवेश से जुड़ी हो सकती है। यह पिछले शोध के अनुरूप है जो यह दर्शाता है कि राजनीतिक परिवार अक्सर शिक्षा क्षेत्र में निवेश करते हैं, क्योंकि वे अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा को बढ़ाने, संरक्षण नेटवर्क का विस्तार करने और गोपनीय वित्तीय लेनदेन को सुविधाजनक बनाने की इसकी क्षमता के बारे में जानते हैं (वर्मा 2011)। विधायकों या उनके रिश्तेदारों की निजी शिक्षा बाज़ार में प्रत्यक्ष भागीदारी तब और बढ़ जाती है जब वे सत्तारूढ़ दल से अपने जुड़ाव का लाभ उठा सकते हैं।

स्कूलों की गुणवत्ता का क्या?

निजी स्कूलों के विकास के बारे में हमारे मुख्य निष्कर्षों के निहितार्थों की गहराई से पड़ताल करने और विश्लेषण से पता चलता है कि इन निजी स्कूलों की गुणवत्ता पर कोई महत्वपूर्ण सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है। जब हम निजी स्कूलों के भौतिक बुनियादी ढाँचे और शिक्षक योग्यता के साथ-साथ, इन निर्वाचन क्षेत्रों के बच्चों के अधिगम के आधार पर गुणवत्ता का आकलन करते हैं तब यह बात सच साबित होती है। इसका तात्पर्य यह है कि राजनेता अधिक निजी स्कूलों की स्थापना में मदद तो कर सकते हैं, लेकिन इससे शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार नहीं होता है। इसके अलावा, यह मान लेना उचित होगा कि मौजूदा स्कूलों की तुलना में गुणवत्ता में बेहतर स्कूलों को मान्यता और संबद्धता प्राप्त करने के लिए राजनीतिक हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं होती है। परिणामस्वरूप, राजनीतिक रूप से समर्थित स्कूल अपने गुणवत्ता मानकों को बढ़ाने में प्रभावी नहीं हो सकते हैं।

निष्कर्ष और निहितार्थ

अध्ययन से पता चलता है कि सत्तारूढ़ दल से जुड़े राजनेता निजी स्कूलों और उच्च शिक्षा संस्थानों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। गठबंधन वाले नेताओं के निर्वाचन क्षेत्रों में, गुटनिरपेक्ष नेतृत्व वाले निर्वाचन क्षेत्रों की तुलना में निजी स्कूलों की संख्या में वृद्धि दर अधिक पाई गई है। हालांकि, सत्तारूढ़ दल से जुड़े राजनेताओं वाले निर्वाचन क्षेत्रों में अधिक निजी स्कूल स्थापित हुए हैं, हमारे निष्कर्ष बताते हैं कि यह वृद्धि शैक्षिक गुणवत्ता या सीखने के परिणामों में महत्वपूर्ण सुधार में परिवर्तित नहीं हुई है, जिससे स्कूल विकास में राजनीतिक भागीदारी की प्रभावकारिता पर सवाल उठते हैं। इसलिए, नीति-निर्माताओं के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे इस राजनीतिक रूप से प्रेरित स्कूल विस्तार के प्रभावों को समझ लें और ऐसे नियम बनाएँ जिनके कारण संख्या में वृद्धि के साथ-साथ गुणवत्ता मानकों को भी बनाए रखा जाएगा।

अंग्रेज़ी के मूल लेख और संदर्भों की सूची के लिए कृपया यहां देखें।

लेखक परिचय : मुनीर कल्लियिल भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) बैंगलोर में अर्थशास्त्र विभाग में डॉक्टरेट के उम्मीदवार हैं। 2022-2023 में, उन्हें जर्मनी में डीएएडी-वित्त पोषित पीएचडी एक्सचेंज प्रोग्राम के लिए चुना गया था। उन्होंने पहले यूनिसेफ इंडिया में रिसर्च फेलो के रूप में काम किया है। उन्होंने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) बॉम्बे से योजना और विकास में एमफिल और जामिया मिलिया इस्लामिया, दिल्ली से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। सोहम साहू ब्रिटेन के लॉफबोरो विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर हैं। वह भारतीय प्रबंधन संस्थान बैंगलोर के सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी से भी जुड़े हैं। उन्होंने भारतीय सांख्यिकी संस्थान, दिल्ली से मात्रात्मक अर्थशास्त्र में पीएचडी की है। आईआईएम बैंगलोर में शामिल होने से पहले, उन्होंने जर्मनी के गोएटिंगेन विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग में पोस्टडॉक्टरल शोधकर्ता के रूप में काम किया है। 

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