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सावधानी और अवसर में तालमेल बिठाना : वाणिज्यिक बैंकिंग में एफडीआई पर आरबीआई का नया रुख

पिछले कुछ वर्षों में आरबीआई ने वाणिज्यिक बैंकिंग में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) पर सतर्क रुख से हटकर व्यावहारिक, मामला-दर-मामला उदारीकरण वाला रुख अपनाया है, जिससे ज़्यादा विदेशी हिस्सेदारी की अनु...

  • दृष्टिकोण

शिक्षकों का विकास और स्कूल का प्रदर्शन- अच्छा प्रदर्शन करने वाले स्कूलों से सात सबक

स्कूली शिक्षण प्रक्रिया में शिक्षकों की केन्द्रीय भूमिका का महत्त्व सब जानते हैं, फिर भी गुणवत्तापूर्ण परिणामों की राह में ज़मीनी स्तर पर चुनौतियाँ आती हैं। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के स्कूलों में हुए...

  • फ़ील्ड् नोट

क्या न्यायाधीश अपने जैसे प्रतिवादियों का पक्ष लेते हैं? भारतीय न्यायालयों से साक्ष्य

दुनिया भर में होने वाले शोध अध्ययनों से पता चला है कि सत्ता में विभिन्न पदों पर बैठे लोग उन लोगों को प्राथमिकता देते हैं जिनकी सामाजिक पहचान उनसे मिलती-जुलती होती है। यह जानने के लिए कि क्या भारतीय न्...

  • लेख
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क्या व्यावसाय के लिए जाति की पहचान अभी भी मायने रखती है?

आज के भारत में, केवल जातिगत पहचान की भावना के कारण लोग किस हद तक नौकरियों को नजर अंदाज करते हैं? यह लेख ग्रामीण ओडिशा में किए गए एक प्रयोग पर चर्चा करता है जिसमें अस्थायी काम के इच्छु?क श्रमिकों को एक...

  • लेख

कार्यरत बैंक ऋण पर विवादों का प्रभाव: भारतीय सीमा क्षेत्रों से साक्ष्य

विवाद, महत्वहपूर्ण व्यक्तियों के निर्णयों के माध्यम से आर्थिक परिणामों को प्रभावित कर सकता है। इस लेख में भारत-पाकिस्तान सीमा पर लगातार गोलाबारी की घटनाओं के सीमावर्ती जिलों में कार्यरत ऋण अधिकारियों ...

  • लेख

क्या राजनीतिक आरक्षण कारगर है? यदि हाँ तो किसके लिए?

क्या राजनीतिक आरक्षण विकास को कमजोर करता है या उसे बढ़ावा देता है, तो किसके लिए? यह लेख भारत के 'अनुसूचित क्षेत्रों' का विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जहाँ ऐतिहासिक रूप से वंचित अनुसूचित जनजातियों के लिए ...

  • लेख

लोक-स्वास्थ्य कैसे बने राजनीतिक प्राथमिकता

आज सारा विश्व कोरोना महामारी की समस्या से जूझ रहा है जिस पर अनेक कोणों से शोधकर्ताओं ने प्रामाणिक आलेख प्रस्तुत किए हैं। भावेश झा द्वारा इस आलेख में आम जनता के स्वास्थ्य को राजनीतिक प्राथमिकता कैसे प्...

  • दृष्टिकोण

कोविड-19: बिहार लौटते प्रवासी मजदूर, ग्रामीण आजीविका तथा सामाजिक सुरक्षा

कोविड-19 के प्रसार को कम करने के लिए लागू किए गए लॉकडाउन के कारण अनेक प्रवासी मजदूरों ने अपना रोज़गार गँवाया और उनमें से करीब 30 लाख से ज्‍यादा प्रवासी दूसरे राज्यों से बिहार लौटे। इस विषय पर प्रोफेस...

  • पॉडकास्ट

हमें भारत के बच्चों को निराश नहीं करना है

कोविड-19 महामारी के कारण स्कूल बंद हैं और पूरी दुनिया में करोड़ों बच्चे घर में बैठे रहने को मजबूर हैं। अनिश्चितता से भरे इस दौर में, खास तौर पर बच्चों को सामान्य हालात की कुछ झलक चाहिए। उनकी ज़रूरतों के...

  • दृष्टिकोण

भूख और अनिश्चितता: ओडिशा के खानाबदोश भविष्यश-वक्ताजओं की स्थिति

अबिनाश दाश चौधरी, जो भारत में कोविड-19 से जुड़े मानवीय संकट पर पाक्षिक डेटा प्रस्तुत करने के लिए शोधकर्ताओं के एक नेटवर्क के हिस्से के रूप में काम करते हैं, ने इस लेख में दक्षिण ओडिशा के पारंपरिक भविष...

  • लेख

कैंसर जांच के लिए ‘मोबाइल कैंप’ पर पुनर्विचार करना

मोबाइल शिविरों के माध्यम से कैंसर की निवारक जांचों की संख्याप बढ़ाने के लिए सार्वजनिक-निजी प्रयासों के बावजूद, इस बीमारी के कारण मृत्यु दर अधिक बनी हुई है। इस लेख में घोष एवं सेकर ने बड़ी संख्या में ल...

  • दृष्टिकोण

वन अधिकार अधिनियम का क्रियान्वयन: महाराष्ट्र के दो गांवों की कहानी

वन अधिकार अधिनियम (2006) भारत में एक ऐतिहासिक वन कानून था, जिसके तहत वन संसाधनों पर व्यक्तिगत एवं सामुदायिक अधिकारों को मान्यता दी गई। हालांकि नवंबर 2018 तक देश भर में प्राप्त कुल दावों में से केवल 44...

  • फ़ील्ड् नोट

कोविड-19, जनसंख्या और प्रदूषण: भविष्य के लिए एक कार्ययोजना

वर्तमान में चल रही कोविड-19 महामारी के बहुआयामी प्रभाव दिख रहे हैं और इसने हमारे समक्ष दो दीर्घकालिक मुद्दे भी रख दिये हैं। वे हैं - जनसंख्या और प्रदूषण। इस आलेख में ऋषभ महेंद्र एवं श्वेता गुप्ता ने क...

  • लेख

क्या भारत अपने सरकारी स्कूलों में सुधार कर सकता है? - शोध कहता है हां

यह एक महत्वपूर्ण नीतिगत प्रश्न है कि क्या छात्र परिणामों को प्रभावी ढंग से बढ़ाने के लिए सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता में पर्याप्त सुधार किया जा सकता है। यह लेख भारत में उच्च गुणवत्ता वाले सार्वजनिक स्क...

  • लेख

सेवानिवृत्ति के बाद की नियुक्तियों की राजनीति: सर्वोच्च न्याेयालय में भ्रष्टाचार?

भारतीय न्यायपालिका न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा करती है। कार्यकारी हस्तक्षेप से सावधान रहते हुए न्यायाधीश अपने संस्थागत हितों को बचाते हैं। लेकिन क्या भारत की न्यायिक व्यवस्था न्यायिक स्वतंत्रता के उल्...

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