क्या अस्थाई युद्धकालीन लामबंदी (मोबिलाइज़ेशन) से किसी अर्थव्यवस्था को स्थाई रूप से नया स्वरूप मिल सकता है? इस लेख में दर्शाया है कि जिन भारतीय ज़िलों को द्वितीय विश्व युद्ध से संबंधित अधिक ऑर्डर मिले थे, उनमें छह दशक से भी अधिक समय बाद कृषि से उद्योग और सेवाओं की ओर व्यापक परिवर्तन देखा गया, और इस संरचनात्मक परिवर्तन का अधिकांश हिस्सा भारी उद्योगों में खरीद के कारण था। इन ज़िलों में उच्च उपभोग स्तर, शहरीकरण दर और रात्रिकालीन रोशनी (नाइटटाइम ल्यूमिनोसिटी) भी देखी गई।
1 सितंबर, 1939 को जर्मनी ने पोलैंड पर आक्रमण किया और द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत हुई। इस बात की जानकारी कम ही लोगों को है कि भारत के ब्रिटिश वायसराय, लॉर्ड लिनलिथगो ने किसी भी भारतीय राजनीतिक नेता से परामर्श किए बिना, 3 सितंबर, 1939 को जर्मनी के खिलाफ युद्ध में भारत के प्रवेश की घोषणा की (राघवन 2017)। इसके चलते एक ब्रिटिश उपनिवेश के रूप में, भारत युद्ध सामग्री का एक बड़ा आपूर्तिकर्ता बन गया, जिसकी कुल युद्धकालीन खरीद भारत के 1938 के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग छठा हिस्सा थी। यह भारतीय अर्थव्यवस्था में ब्रिटिश राज का अंतिम बड़ा हस्तक्षेप था।
इतिहासकारों ने लंबे समय से इस बात पर बहस की है कि द्वितीय विश्व युद्ध ने भारत के औद्योगिक विकास को प्रोत्साहित किया या बाधित किया। कुछ का तर्क है कि युद्ध ने युद्ध से संबंधित वस्तुओं की मांग पैदा करके और तकनीकी उन्नयन को बढ़ावा देकर भारतीय औद्योगीकरण को गति दी (मॉरिस 1983, रॉय 2016)। कुछ अन्य का मानना है कि ये लाभ अल्पकालिक थे, क्योंकि अंग्रेज़ों ने मुख्य रूप से अपने युद्ध प्रयासों के लिए ही संसाधन प्राप्त किए थे (टॉमलिंसन 1996, कामटेकर 2002)। हमने एक नए अध्ययन (पर्वतनेनी और यैंग 2024) में, भारतीय जिलों के संरचनात्मक परिवर्तन और आधुनिक विकास पर द्वितीय विश्व युद्ध के लामबंदी (मोबिलाइज़ेशन) के दीर्घकालिक प्रभावों का व्यवस्थित विश्लेषण किया है।
युद्धकालीन लामबंदी (मोबिलाइज़ेशन) नीतियाँ औद्योगिक नीतियों से मिलती-जुलती हैं, जिनका उद्देश्य रणनीतिक क्षेत्रों के लिए आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन करना होता है। पूरी तरह से समान न होते हुए भी, भारत में द्वितीय विश्व युद्ध की लामबंदी (मोबिलाइज़ेशन) के प्रभावों का अध्ययन आज बड़े पैमाने पर औद्योगिक नीति हस्तक्षेपों के संभावित प्रभावों के बारे में बहुमूल्य जानकारी उपलब्ध कराता है। दोनों में ही अर्थव्यवस्था के औद्योगिक ढांचे को आकार देने के सरकारी प्रयास शामिल हैं, जो प्रमुख क्षेत्रों के तेजी से विकास पर केंद्रित हैं। दोनों ही मामलों में सरकारी खरीद एक प्रमुख नीतिगत साधन के रूप में कार्य करती है, जिसे अक्सर सब्सिडी, पूंजी निवेश और ज्ञान हस्तांतरण पहलों द्वारा पूरित किया जाता है। जिस प्रकार से आधुनिक औद्योगिक नीतियाँ उच्च तकनीक या उन्नत विनिर्माण क्षेत्रों को लक्षित करती हैं, ठीक उसी तरह द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारत में भारी उद्योग और युद्ध सामग्री को प्राथमिकता दी गई थी। इसमें नई औद्योगिक क्षमताओं का विकास, समन्वय संबंधी समस्याओं पर काबू पाना और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को सुगम बनाना शामिल था– ये ऐसी चुनौतियाँ हैं, जिनका सामना औद्योगिक नीति-निर्माता आज भी कर रहे हैं।
विकास अर्थशास्त्र के शुरुआती दौर से ही, विद्वानों ने कृषि से उद्योग की ओर संरचनात्मक परिवर्तन को बढ़ावा देने में औद्योगिक नीति की क्षमता पर प्रकाश डाला है (रोसेनस्टीन-रोडन 1943)। दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे कई पूर्वी एशियाई देशों में आर्थिक विकास को गति देने का श्रेय औद्योगिक नीति को दिया गया है (एम्सडेन 1989, वेड 1990, रोड्रिक 1995)। हालांकि, अन्य विद्वानों का तर्क है कि औद्योगिक नीति अप्रभावी या यहाँ तक कि हानिकारक भी रही है (बाल्डविन 1969, बीसन और वीनस्टीन 1996, लेडरमैन और मैलोनी 2012)।
हम एक उभरते हुए शोध साहित्य में योगदान दे रहे हैं जिसमें औद्योगिक नीति के प्रभावों को समझने के लिए ऐतिहासिक प्राकृतिक प्रयोगों का उपयोग किया जाता है। हाल के अध्ययनों में दक्षिण कोरिया के 1970 के दशक के भारी और रासायनिक उद्योग अभियान (लियू 2019, चोई और लेवचेंको 2021, किम एवं अन्य 2021, लेन, आगामी), फिनलैंड के द्वितीय विश्व युद्ध के मुआवज़े (मित्रुनेन 2025), फ्रांस में आयात व्यापार संरक्षण (जुहाज़ 2018), ब्रिटिश जहाज निर्माण में अस्थाई इनपुट लागत लाभ (हैनलॉन 2020) और साथ ही चीन में ऐतिहासिक औद्योगिक संयंत्र स्थापना (फैन और ज़ू 2021, हेब्लिच एवं अन्य 2022, बो एवं अन्य 2023) का अनुभवजन्य विश्लेषण शामिल है।
अनुभवजन्य रणनीति
हम भारतीय जिलों के संरचनात्मक परिवर्तन पर युद्धकालीन लामबंदी (मोबिलाइज़ेशन) के कारणात्मक प्रभाव का अनुमान लगाने के लिए, एक 'शिफ्ट-शेयर दृष्टिकोण' (बोरुसियाक एवं अन्य 2022 का अनुसरण करते हुए) अपनाते हैं जिसके तहत उद्योगों में ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकारी खरीद में जिला-स्तरीय भिन्नता का अनुमान लगाया जाता है।
शिफ्ट-शेयर रणनीति का अंतर्ज्ञान इस प्रकार है : ब्रिटिश युद्धकालीन खरीद विभिन्न उद्योगों में भिन्न थी, कुछ उद्योगों (उदाहरण के लिए, गोला-बारूद) में बहुत अधिक मांग देखी गई, कुछ (उदाहरण के लिए, जूते) में मध्यम स्तर की मांग देखी गई, और अन्य में युद्धकालीन माँग कम या शून्य रही (उदाहरण के लिए, संगीत वाद्ययंत्र, आभूषण, मिट्टी के बर्तन)। भारतीय जिलों में युद्ध-पूर्व विभिन्न उद्योगों की उपस्थिति भी भिन्न थी, जैसा कि उद्योगों में जिले के रोज़गार के वितरण से मापा गया है। कुछ जिलों में युद्ध से संबंधित उद्योगों में रोज़गार का हिस्सा अपेक्षाकृत अधिक था, जैसे कि गोला-बारूद और जूते, जबकि अन्य जिलों में यह हिस्सा कम था। युद्ध-संबंधी उद्योगों में युद्ध-पूर्व रोज़गार हिस्सेदारी वाले जिलों में युद्ध-संबंधी खरीद के कारण मांग में (प्रति श्रमिक के आधार पर) अधिक वृद्धि होनी चाहिए थी। हमारे दृष्टिकोण में एक शिफ्ट-शेयर चर का निर्माण शामिल है जो किसी जिले में प्रति कर्मचारी ऑर्डर के भारतीय रुपये मूल्य का अनुमान लगाता है। प्रति कर्मचारी अनुमानित युद्ध-संबंधी खरीद का स्थानिक वितरण आकृति-1 में दर्शाया गया है।
आकृति-1. अनुमानित युद्ध-संबंधी खरीद में स्थानिक भिन्नता
डेटा
हम डेटा के दो नवीन स्रोतों का उपयोग करते हैं। पहला, हम ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार द्वारा भारत में की गई द्वितीय विश्व युद्ध की सामग्री की खरीद से संबंधित एक अनूठे सारणीकरण का लाभ उठाते हैं, जिसमें लगभग 384 अलग-अलग खरीदे गए उत्पादों का कुल रुपया मूल्य प्रदान किया गया है (अग्रवाल 1947)। दूसरा, हमने 1911 से 1981 तक की भारतीय जनगणनाओं से ऐतिहासिक जिला-स्तरीय आर्थिक संरचना डेटा का डिजिटलीकरण किया, जो पहले इलेक्ट्रॉनिक रूप में उपलब्ध नहीं था। हम अग्रवाल (1947) से युद्ध-पूर्व जनगणना से प्राप्त विस्तृत व्यवसाय स्तर पर जिला-स्तरीय रोज़गार और उत्पाद-स्तरीय युद्ध खरीद संबंधी जानकारी के आधार पर, अपना प्रमुख शिफ्ट-शेयर चर बनाते हैं। जनगणना के आँकड़ों से कृषि से आधुनिक (उद्योग और सेवा) क्षेत्रों में संरचनात्मक परिवर्तन जैसे प्रमुख परिणाम चरों के बारे में जानकारी मिलती है।
मुख्य परिणाम
हम पाते हैं कि द्वितीय विश्व युद्ध की खरीद का संरचनात्मक परिवर्तन पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ा। युद्ध के छह दशक से भी अधिक समय बाद, हम पाते हैं कि प्रति कर्मचारी ऑर्डर में एक मानक-विचलन1 की वृद्धि से आधुनिक क्षेत्रों में रोज़गार का हिस्सा 6.5 प्रतिशत अंक बढ़ गया। ये परिणाम कई कारकों से जुड़े समय के रुझानों- युद्ध-पूर्व आर्थिक संरचना, औपनिवेशिक प्रशासन का प्रकार, पूर्व-औपनिवेशिक संघर्षों की संख्या, भौगोलिक कारक और सैन्य भागीदारीको नियंत्रित करने के लिए ठोस हैं। आकृति-2 दर्शाती है कि ये प्रभाव 1951 में ही उभर कर सामने आए और 60 से अधिक वर्षों तक बने रहे। उल्लेखनीय है कि हमें 1911 और 1921 में पूर्व-प्रवृत्तियों का कोई प्रमाण नहीं मिलता है, जिसका अर्थ है कि युद्ध-संबंधी सामग्री के आदेश उन जिलों को असमान रूप से आवंटित नहीं किए गए थे जो पहले से ही औद्योगीकरण की राह पर तेजी से आगे बढ़ रहे थे।
आकृति-2. उद्योग और सेवाओं में रोज़गार पर युद्ध-संबंधी खरीद का प्रभाव
टिप्पणी : ऊर्ध्वाधर स्पाइक्स 95% विश्वास अंतराल (सीआई) दर्शाते हैं। यह दर्शाता है कि यदि प्रयोग को नए नमूनों के साथ बार-बार दोहराया जाए, तो 95% बार, परिकलित विश्वास अंतराल में वास्तविक प्रभाव होगा।
इसके बाद, हम यह जाँच करते हैं कि जिन ज़िलों को युद्ध-संबंधी सामग्री के लिए ज़्यादा ऑर्डर मिले, क्या उन्हें उद्योग या सेवाओं में ज़्यादा लाभ हुआ। हालांकि ज़्यादातर ख़रीद औद्योगिक प्रकृति की थी, फिर भी हमें सेवा क्षेत्र के रोज़गार पर काफ़ी प्रभाव देखने को मिलता है। हम ‘क्रॉस-सेक्टर स्पिलओवर’ की जाँच के लिए, एक वैकल्पिक शिफ्ट-शेयर के साथ इसी तरह का विश्लेषण करते हैं, जिसमें गैर-औद्योगिक क्षेत्रों- सेवाओं और कृषि में युद्ध-खरीद को शामिल नहीं किया जाता है, जिनकी युद्ध-संबंधी खरीद में हिस्सेदारी क्रमशः 1.5% और 2.5% है। इस अभ्यास का लक्ष्य केवल उद्योग-आधारित युद्धकालीन खरीद का सेवा क्षेत्र के रोज़गार पर पड़ने वाले प्रभाव को अलग करना है। आकृति-3 में दर्शाए गए परिणाम, औद्योगिक युद्धकालीन खरीद से सेवा क्षेत्र पर पड़ने वाले महत्वपूर्ण प्रभावों की पुष्टि करते हैं।
आकृति-3. केवल उद्योग-आधारित शिफ्ट-शेयर के प्रभाव
हम 2011 की भारतीय जनगणना के आँकड़ों का उपयोग करते हुए, आगे पाते हैं कि उपभोक्ता सेवाएं (यानी, सेवाओं की घरेलू मांग) युद्ध-संबंधी के लिए सबसे बड़ी प्रतिक्रिया दर्शाती हैं। ये परिणाम मर्फी एवं अन्य (1989) जैसे सैद्धांतिक मॉडल के अनुरूप हैं। इन मॉडलों में से एक तंत्र श्रमिक क्रय शक्ति के माध्यम से संचालित होता है। इसमें मूल विचार यह है कि अर्थव्यवस्था में किसी भी एक फर्म के लिए बेहतर तकनीक में अपग्रेड करना लाभदायक नहीं है। तथापि, जब फर्म एक ही समय में निवेश करने और अपग्रेड करने के लिए समन्वय करती हैं, तो कुल श्रमिकों की मज़दूरी और इस प्रकार क्रय शक्ति बढ़ जाती है, जिससे अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं की मांग बढ़ जाती है। इससे औद्योगीकरण का उच्च संतुलन बना रहता है और आधुनिक क्षेत्रों में रोज़गार के अवसरों में वृद्धि होती है। हमारे अध्ययन में, युद्ध-संबंधी खरीद से कई फर्मों को निवेश करने और समन्वय समस्या को हल करने (या तो सरकारी निवेश के माध्यम से उन्नयन की निश्चित लागत को कम करने के लिए, या युद्ध-संबंधी खरीद से बाजार का आकार बढ़ाने के लिए) के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता था।
हम यह भी विश्लेषण करते हैं कि संरचनात्मक परिवर्तन मुख्य रूप से भारी या हल्के उद्योगों में खरीद के कारण था। भारी (वाहन, गोला-बारूद, इंजीनियरिंग भंडार, रासायनिक उत्पाद) बनाम हल्के उद्योगों (वस्त्र, वस्त्र, जूते, खाद्य उत्पाद) में युद्ध-संबंधी खरीद के अलग-अलग विश्लेषणों से यह संकेत मिलता है कि भारी उद्योग की खरीद दीर्घकालिक संरचनात्मक परिवर्तन का प्राथमिक चालक थी (आकृति-4)।
आकृति-4. हल्के उद्योग शिफ्ट-शेयर (बाएँ पैनल) और भारी उद्योग शिफ्ट-शेयर (दाएँ पैनल) के प्रभाव
अंत में, हम 'क्रॉस-सेक्शनल' विश्लेषण की ओर रुख करते हैं क्योंकि इन परिणामों की जानकारी केवल युद्धोत्तर काल में ही उपलब्ध है। हम पाते हैं कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जिन जिलों को प्रति श्रमिक अधिक ऑर्डर मिले, उनमें वर्ष 2011 में शहरीकरण की दर अधिक थी और वर्ष 2012 में प्रति व्यक्ति उपभोग अधिक रहा। ये परिणाम बाहरी स्पेस से भी स्पष्ट हैं- जिन जिलों को अधिक ऑर्डर मिले, उनमें उपग्रहों द्वारा देखी गई रात्रिकालीन रोशनी (नाइटटाइम ल्यूमिनोसिटी) अधिक है। ये सभी परिणाम द्वितीय विश्व युद्ध की खरीद के जिलों पर दीर्घकालिक सकारात्मक प्रभावों को और मज़बूत करते हैं।
नीतिगत निहितार्थ
ये निष्कर्ष युद्ध के लिए लामबंदी के आर्थिक परिणामों के बारे में हमारी समझ को और गहरा करते हैं। जिस प्रकार युद्धकालीन खरीद ने भारत की स्वतंत्रता के बाद की औद्योगिक प्रगति को आकार दिया, उसी प्रकार स्वच्छ ऊर्जा, अर्धचालक या रक्षा विनिर्माण के लिए प्रोत्साहन जैसी आज की रणनीतिक औद्योगिक नीतियां आर्थिक संरचना पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकती हैं।
हालांकि आधुनिक औद्योगिक नीति युद्धकालीन मोबिलाइज़ेशन से भिन्न है, दोनों ही उत्पादन संरचनाओं को आकार देने, रणनीतिक क्षेत्रों को विकसित करने और तकनीकी उन्नयन को सुगम बनाने के लिए राज्य-नेतृत्व वाले प्रयासों पर निर्भर करती हैं। ये ऐतिहासिक सबक आज महत्वाकांक्षी औद्योगिक नीतियों पर विचार कर रहे विकासशील देशों के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक हैं।
निष्कर्ष
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान के भारत के अनुभव दर्शाते हैं कि अस्थाई आर्थिक झटकों का संरचनात्मक परिवर्तन पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है। युद्धकालीन खरीद ने औद्योगिक और सेवा क्षेत्र के विकास को गति दी, जिसके प्रभाव दशकों बाद भी दिखाई दे रहे हैं। ये निष्कर्ष दर्शाते हैं कि सुनियोजित औद्योगिक नीतियाँ, भले ही शुरुआत में बाहरी झटकों से प्रेरित हों, दीर्घकालिक आर्थिक परिवर्तन ला सकती हैं। जैसे-जैसे नीति-निर्माता तकनीकी बदलावों और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के मद्देनजर अर्थव्यवस्थाओं को नया आकार देने की कोशिश कर रहे हैं, युद्धकालीन मोबिलाइज़ेशन से प्राप्त ऐतिहासिक जानकारी इस दिशा में अत्यधिक प्रासंगिक बनी हुई है।
टिप्पणी :
- मानक विचलन एक ऐसा माप है जिसका उपयोग किसी मान समूह के माध्य (औसत) मान से उसके परिवर्तन या फैलाव की मात्रा को मापने के लिए किया जाता है।
अंग्रेज़ी के मूल लेख और संदर्भों की सूची के लिए कृपया यहां देखें।
लेखक परिचय : अनीशा पार्वतनेनी मिशिगन विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग में पीएचडी की उम्मीदवार हैं। उनकी शैक्षणिक रुचियां विकास अर्थशास्त्र, औद्योगिक नीति, राजनीतिक अर्थव्यवस्था और लिंग में फैली हुई हैं। इससे पहले उन्होंने येल विश्वविद्यालय में टोबिन प्री-डॉक्टरल फेलो और जे-पीएएल साउथ एशिया, बैंगलोर में एक रिसर्च एसोसिएट के रूप में काम किया है। उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से अर्थशास्त्र में मास्टरस डिग्री और दिल्ली विश्वविद्यालय के इंद्रप्रस्थ कॉलेज फॉर विमेन से अर्थशास्त्र में स्नातक की डिग्री प्राप्त की है। डीन यैंग मिशिगन विश्वविद्यालय में एक विकास अर्थशास्त्री हैं, जहाँ वे अर्थशास्त्र विभाग में प्रोफेसर, फोर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी में प्रोफेसर और जनसंख्या अध्ययन केन्द्र (सामाजिक अनुसंधान संस्थान) में शोध प्रोफेसर हैं। वे जर्नल ऑफ डेवलपमेंट इकोनॉमिक्स के सह-संपादक भी हैं। शैक्षणिक वर्ष 2024-25 के दौरान, वे सीईएमएफआई में मारिया डे माएत्ज़ु विज़िटिंग प्रोफेसर के रूप में अवकाश काल में हैं।
क्या आपको हमारे पोस्ट पसंद आते हैं? नए पोस्टों की सूचना तुरंत प्राप्त करने के लिए हमारे टेलीग्राम (@I4I_Hindi) चैनल से जुड़ें। इसके अलावा हमारे मासिक न्यूज़ लेटर की सदस्यता प्राप्त करने के लिए दायीं ओर दिए गए फॉर्म को भरें।




14 अक्टूबर, 2025 








Comments will be held for moderation. Your contact information will not be made public.